एक बोध कथा

apni baat!  Umesh Pathak ke saath. जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय " हमें याद आती है । दर्शनशास्त्र के... [पूरी पोस्ट]
writer Umesh Pathak / उमेश पाठक
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[06 Apr 2010 07:21 AM]

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