वक्त मरहम हो जाये
हमने बोये थे ये कांटे फ़ूलों की हिफ़ाजत के लिये
क्या करें जब बाड ही
खेतों की दुश्मन हो जाये बात करते तो बताता
क्या है दिल में उनके लिये
अब सोचता हूं कुछ न कहूं
कहीं और न उलझन हो जाये ऐ वक्त तू यूं ही गुजर जाना
न पूछना लम्हों का हिसाब
जिक्र चला गर, समेटने...
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मोहिन्दर कुमार
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[06 Apr 2010 02:37 AM]



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