ज़ख्म
माज़ी के दाग यादों से जाते क्यों नहीं,
मैं तो भुल चला, ये ज़क्म मुझे भुलाते क्यों नहीं|
झटक दूं इन्हें ज़हन से तो साँस मिले,
मार तो दिया है मुझे, ज़ालिम दफनाते क्यों नहीं|
ना अश्क से सींचा, ना ख्यालों की ज़मीन दी,
फिर भी दर्द के ये फूल, मुरझाते...
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वीर
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[05 Apr 2010 23:35 PM]



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