है शिकार इन्सान

मनोरमा दूर हुआ कर्तव्य से अधिकारों का ज्ञान।बना शिकारी आदमी है शिकार इन्सान।।मतलब की बातें हुईं अब तो छोड़ो साथ।बिना स्वार्थ के आजकल कौन मिलाता हाथ।।बाहर में सुख है कहाँ ओछे कारोबार।अपने अन्दर झाँकिये बहुत सुखद संसार।।चेहरे पर दुख न दिखे चिपकाया मुस्कान।यह नकली... [पूरी पोस्ट]
writer श्यामल सुमन

कविता

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[05 Apr 2010 23:15 PM]

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