न्याज़ वर्सस प्रशाद

अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ इसी वृहस्पतिवार ही की बात है। सुबह यही कोई ग्यारह बजे होंगे। बहुत ध्यान से और संभल-संभलकर मरीज़ देख रहा था। कि इतने में मेरे एक मरीज़ जो काफी लम्बे अरसे से मुझसे इलाज कराते-कराते मेरे अच्छे दोस्त भी हो गये हैं। उनका ओपीडी में प्रवेश हुआ। हाल-चाल पूछने के... [पूरी पोस्ट]
writer huda
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[05 Apr 2010 12:07 PM]

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