फिर हुआ..
फिर हुआ हम अपनाइयों में घिरेकिरकिरायी कितनीं, टूटे कांच के टुकड़े, किरकिराती थकाती, बनाती रहीं ग़लतफ़हमियां, ज़ाहिर है होना थाआख़िर आदमी की जात हैं, हुआहम चौंके चौंकते रहे, मगर सच्चा डरे, बहुत आसानी से बड़ी रवानी में सीधे एकदम साफ़-साफ़ गिरे....
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Pramod Singh
मुक्त गद्य के गल्प
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[05 Apr 2010 15:10 PM]



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