सम्पादकीय: खोई हुई पगडण्डियाँ
जैसे मनुष्य अधूरा है वैसे मनुष्य की कला अधूरी है। इस अधूरेपन का अहसास ही जीवन को सौन्दर्यमय और गतिशील बनाने में तत्पर रहता है। इस अधूरेपन को कभी मृत्यु अर्थ देती है, कभी जीवन की दूसरी आवश्यकताएँ। इन दोनों से बचकर मनुष्यता ने यदि कुछ हासिल किया है तो वह...
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सम्पादकीयविजय शंकर
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[05 Apr 2010 12:54 PM]



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