मनीष क़ी कलम से आपके खिदमत मे ....
१.है तकलीफ कि वो खुद हीं बँट चूका हैचंद नमो मे कहीं अल्लाह तो कहीं इश्वरके चाहने वालो मे ।वो कहता है हम तो एक है एक हींधरती बनाई तुम हीं तो जिसने लकीरखिंच इसपर सरहदें बनाई । २.हमे खुद पे नहीं खुदा पे तरस आता है हसीनो को जमी पे भेज नजाने कैसे आसमा पे रहता...
[पूरी पोस्ट]
मनीष झा
12
0
0
0
2
[05 Apr 2010 09:06 AM]



Shuffle








