‘जो जनता नईं पचा पाएगी मेवे की गुझियां’
कथा अद्भुत है। प्रसंग होली का है। किस्सा भोपाल का है। कुछ यूं है कि भंग की तरंग में डूबे सूरमा भोपाली होली पर शहर घूमने निकले हैं। तरंग में हैं सूरमा इसलिए आज हांक नहीं रहे हैं सच बोल रहे हैं। रास्ते में कहीं उनके पुराने शार्गिद बाबूभाई मिल जाते हैं।...
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अनुज
vyangya
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[05 Apr 2010 07:02 AM]



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