टहलाते-टहलाते
गम टहल गया मुझको टहलाते-टहलातेआजिज आ गया था मेरे समझौते से , राह भूल गयाबाद मुद्दत के हुई उनसे मुलाक़ात जोईद का चाँद उतरा है फलक से , राह भूल गयाआज फिर है इश्क की बाजीगुरूर से कह दो पहरेदार ,राह भूल गयाये कौन सा मुकाम हैनिशान बोलते खड़े राहगीर ,राह भूल...
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शारदा अरोरा
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[05 Apr 2010 02:11 AM]



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