रोटियां कपड़े मुहब्बत, घर सलामत चाहिए
बुलबुलें हम हैं गुलिश्तां है हमारा पर हमें ।अपने ही माहौल में अब हिफाज़त चाहिए॥कुछ नए रंग की ये ग़ज़ल है , पेश कर रहा हूँ ....रोटियां कपड़े मुहब्बत घर सलामत चाहिए।ज़िन्दगी यानी हमें भी पुर शिक़ायत चाहिए ॥दिले खाना ख़राब को यार जम्हूरियत न दे ।इस पे...
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Deepak Tiruwa
ग़ज़ल
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[04 Apr 2010 22:52 PM]



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