दीप बन जलता रहा हूँ
दृष्टि को अपनी उठा कर तुम मुझे देखो न देखोोमैं तुम्हारे द्वार पर बन दीप इक जलता रहा हूँनींद की चढ़ पालकी तुम चल दिये थे जब निशा मेंमैं खड़ा था उस घड़ी बिसरे सपन की वीथियों मेंऔर तुम आलेख लिखते थे नये दिनमान का जबमैं रहा संशोधनों का चिह्न बन कर रीतियों मेंएक...
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राकेश खंडेलवाल
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[04 Apr 2010 21:56 PM]



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