बन्द मुट्ठी
आज सुबह से ही सामने वाला दरवाजा नहीं खुला था। अखबार बाहर ही पड़ा था। 'कहीं चाची....? नहीं, नहीं.....' मैं बुदबुदा उठती हूँ।एक अनजानी आशंका से मन सिहर जाता है, पर मैं इस पर विश्वास करना नहीं चाहती....। मन-ही-मन मैं सोचती हूँ, 'रात को तो बच्चों को बुला रही...
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swati
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[02 Apr 2010 13:44 PM]



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