जिस दिन मैं इतिहास के निर्माण का एक दर्शक था.
साइबर कैफे पर बैठा लिख रहा हूँ तो अजीब सा परायापन लगा. लगा जैसे यहाँ आना ही नहीं चाहिए था. हो सकता है मात्राएँ गलत पड़ जाए क्योंकि ये जो कुछ भी है गूगल इंडिक ट्रांसलिटरेशन के सहारे लिखा जा रहा है. बहुत दिनों बाद आप सब से मुखातिब हूँ तो और भी अजीब लग रहा...
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चन्दन
जनहित
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[04 Apr 2010 10:05 AM]



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