मेरी पसंद....
हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलींउन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँमुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।जिंदगी चाहिए मुझको मानी भरी,चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।लाख उसको अमल में...
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वन्दना अवस्थी दुबे
कविता
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[04 Apr 2010 09:21 AM]



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