लंगड़ा वक्त

वीर की कलम से यादों के बोझ से वक्त लंगड़ा गया है! घड़ी के दो काँटों की बैसाखी लिए.. शाम से रेंग रहा है यहाँ| इसके हर कदम की आहट साफ़ साफ़ सुनाई देती है| यही वक्त था जो हमारे हाथों से यूँ फिसल जाया करता था| कैसे ख़ामोशी से ये अपने तेज कदम रखता था| आकर... [पूरी पोस्ट]
writer वीर

nazmthoughtsproseख्याल

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[04 Apr 2010 00:07 AM]

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