परदेशी निर्मोही !
वह पंथी तो परदेशी है ,कर पल्लव हिला-हिला उसको क्यों व्यर्थ बुलाते हो पादप ,क्यों स्नेह जताते हो पादप ! क्या जाने उसका कौन नगर ,क्या जाने उसकी कौन डगर ,क्या जाने कहाँ लुटायेगा वह स्नेह सुधा प्याले भर-भर !निर्मम होते हैं परदेशी जग तो यह ही कहता आया क्यों...
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Sadhana Vaid
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[03 Apr 2010 23:05 PM]



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