वो बत्ती, वो रातें
बचपन में बत्ती चले जाने में भी गजब का सुख था हम चारपाई पे बैठे तारे गिनते एक कोने से उस कोने तक जहां तक फैल जाती नजर हर बार गिनती गड़बड़ा जाती हर बार विशवास गहरा जाता अगली बार होगी सही गिनती बत्ती का न होना सपनों के लहलहा उठने का समय होता सपने उछल-मचल...
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डॉ वर्तिका नन्दा
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[03 Apr 2010 07:58 AM]



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