अरे कौन तुम !

Unmanaa अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो ! मैंने जीवन के प्रभात में विस्मृति की झाँकी देखी है ,आश लता पर कान्त कल्पना की तितली बाँकी देखी है ,मैंने देखा अरमानों को चहक-चहक मधुरिम स्वर करते ,मैंने देखा अभिलाषा के सागर से तृष्णा घट भरते ,किन्तु अरे... [पूरी पोस्ट]
writer Sadhana Vaid
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[02 Apr 2010 22:15 PM]

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