झिरी से झाँक
तुम जो आए हो आज सुबह सुबह खिड़की की झिरी से झाँक रहे हो। मुझे सरसराहट सी लगी है। सुबह सुबह ऐसा होता है क्या कि दिन दुपहर सा लगे? सिल पर जमी धूल से गुजरती आँखें बोगेनबिलिया के गुलाबी फूलों पर टिकी हैं। सुना है कार्बन मोनो आक्साइड को ऑक्सीजन समझ रक्त सोख...
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गिरिजेश राव
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[02 Apr 2010 20:30 PM]



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