बाँसुरी चली आओ - डा. कुमार विश्वास ( baansuree chalee aao )
तुम अगर नही आई गीत गा न पाऊँगासाँस साथ छोडेगी, सुर सजा न पाऊँगातान भावना की है शब्द-शब्द दर्पण हैबाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण हैतुम बिना हथेली की हर लकीर प्यासी हैतीर पार कान्हा से दूर राधिका-सी हैरात की उदासी को याद संग खेला हैकुछ गलत ना कर बैठें मन...
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हरि शर्मा
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[30 Mar 2010 23:25 PM]



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