मुझे तुम्हारी चाहना है !
उन खर्च होते हुए चन्द जमा दिनों में से, उस एक शाम को जब सूरज सुस्ताने लगा और पंक्षी वापस अपने घरों को लौट चले थे । मैंने कुछ कदम चल लेने के बाद उसकी हथेलियों को अपनी अँगुलियों से छूते हुए अपने होने का आभास कराया था । मेरे होने का, नहीं शायद उस एहसास को...
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अनिल कान्त :
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[02 Apr 2010 10:40 AM]



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