मेरी पगड़ी को जो उछालेंगे.
ग़ज़लतुमको हम सब को बेंच डालेंगे.मसखरे देश क्या सँभालेंगे.ख़ैर अपनी मनायें वे सर की,मेरी पगड़ी को जो उछालेंगे.उनकी फितरत तो सब ही जाने हैं,आस्तीनों में साँप पालेंगे.लोग भी दोगलें कहां कम हैं,इन हकीमों से ही दवा लेंगे.देशद्रोही जो हाथ आये तो ,हम भी फिर...
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डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[02 Apr 2010 10:02 AM]



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