पंक्षी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में

राजू बिन्दास! पंक्षी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूं दुनिया के चमन में...जब भी परिंदों को उड़ते देखता हूं तो ये लाइनें याद आने लगती हैं. कल्पनाओं को पर लग जाते हैं. उस दिन भी जब पिंजरें से करीब पचास गौरैया मुक्त की गई तो सब फुर्र-फुर्र कर उड़ गई सिर्फ एक... [पूरी पोस्ट]
writer rajiv
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[02 Apr 2010 02:59 AM]

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