वह किताब, वह शास्त्र, वह संदेश सही होना चाहिये
मन की यह स्वाभाविक आकांक्षा होती है कि जो मैं मानता हूं, वही दूसरा भी मान ले। यह आकांक्षा क्यों होती है? यह आकांक्षा इसलिये होती है कि मुझे खुद भी भरोसा नहीं है, जो मैं मानता हूं उस पर। जब मैं दूसरे को भी राजी कर लेता हूं, तो थोडा भरोसा आता है। जब भीड...
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अन्तर सोहिल
ओशो
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[02 Apr 2010 01:48 AM]



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