समेटना बिखरे भावों का- भाग २
अभी १० दिन पहले ही इसका भाग १ प्रस्तुत किया था. देखता हूँ तो पाता हूँ कि अपने भावों को इतना बिखेर चुका हूँ यहाँ वहाँ कि समेटने में भी समय लगेगा. कुछ और समेट लाये बिखरे भावों को और प्रस्तुत है आपके लिए. चुप रहना भी कोई, मेरी मजबूरी तो नहीं, हर बात...
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Udan Tashtari
कविता
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[01 Apr 2010 21:00 PM]



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