हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
ग़ालिब कि ग़ज़लें - पार्ट २ हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकलेहज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले । डरे क्यों मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर वो ख़ूँ जो जो चश्मे-तर से उम्र...
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abhi
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[27 Mar 2010 04:43 AM]



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