कई रंग हमने जमाने के देखें,कहीं भूखमरी है,कहीं धन भरा है-----(विनोद कुमार पांडेय)
समझ में न आए,कि क्या माजरा है,ये इंसान है,या कोई सिरफिरा है,ये पैसा,ये रुपया,ये दौलत,ये शोहरत,समझता है सब कुछ इसी में धरा है,ग़रीबों की आहों पे महलें उठाता,लगे जैसे आँखों का पानी मरा है,वहीं आज बनता है,सबसे बड़ा,हज़ारों दफ़ा जो नज़र से गिरा है,कई रंग...
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विनोद कुमार पांडेय
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[01 Apr 2010 12:02 PM]



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