बदलते ज़माने के बदलते ढंग हैं मेरे

उधेड़-बुन बदलते ज़माने के बदलते ढंग हैं मेरेनए हैं तेवर और नए ही रंग हैं मेरेशुद्ध भाषा के शीशमहल में न रख सकोगे कैद मुझेमैं तुम्हे आगाह कर देता हूँ कि संग संग हैं मेरेये तेरी-मेरी भाषा का साम्प्रदायिक तर्क तर्क दोजैसे सुंदर हैं तुम्हारे वैसे ही सुंदर अंग हैं... [पूरी पोस्ट]
writer Rahul Upadhyaya

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[01 Apr 2010 11:13 AM]

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