एक तलाश: तुझमें अपनी

जाते-जाते... सफर शुरू होने सेमंज़िल पर पहुंचने तकखुद को अकेला ही पाता हूंबीच राहों मेंअकेले चलते, तन्हा भटकतेतेरे निशां पाता हूंजाने क्यूं मैं सदाअपने अस्तित्व कोतुझमें तलाशता हूंजाने क्यूं तुझमेंअपना ही अक्समैं अक्सर ढूंढा करता हूंपाता भी हूंहां ! पाता भी हूंखुद... [पूरी पोस्ट]
writer vikas vashisth
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[01 Apr 2010 07:00 AM]

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