आदमी

वीर की कलम से है कोई पुरजे सा आदमी, है ना! घूमता हर लम्हा आदमी, है ना! थक के रुकना उसको गवारा नहीं, बड़ता हर लम्हा आदमी, है ना! अपनी तलाश से वो मायूस नहीं, ढूँढता हर लम्हा आदमी, है ना! अपनी खुदी का सुरूर है उसको, झूमता है लम्हा आदमी, है ना! Filed under: कविताएँ, हिन्दी... [पूरी पोस्ट]
writer वीर

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[01 Apr 2010 04:53 AM]

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