ठहरी ज़िन्दगी
मेरे घर के आँगन में धुप तिरछी पड़ती थी ठीक नौ बजे नौबजिया की कली खिलती थी सुबह स्कूल जाने की हडबडाहट में गर्म दाल चावल से अक्सर ऊँगली और जीभ जलती थीनिकलना देर से और पहुँचने की जल्दी में कच्ची पगडण्डी पे कितनी बार गिरती संभालती थी बरस बीत गए लेकिन ज़िन्दगी...
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Sonal Rastogi
रिश्ते
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[01 Apr 2010 03:33 AM]



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