चाणक्य दर्शन-अपयश से प्राप्त धन किसी काम का नहीं (hindi adhyamik sandesh-Dhan aur yash)
अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु।शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवंतु में।।हिन्दी में भावार्थ-जिस धन की प्राप्ति दूसरों को क्लेश पहुंचाने या शत्रु के सामने सिर झुकाने से हो वह स्वीकार करने योग्य नहीं है।पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी...
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दीपक भारतदीप
आध्यात्म
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[31 Mar 2010 19:55 PM]



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