Hindi Poems by Archana Panda
मुस्कानों की कीमत, रिश्तों की व्यापारी सीख गयी,बाजारों के जैसे, कैसे बदले यारी सीख गयी ...बड़ा नाज़ था मुझे कभी, के दिल का मोल नहीं होता,तेरे प्यार में यारा मैं तो दुनियादारी सीख गयी ...(c)ArchanaMuskaanon ki kimat, Rishton ki Vyapaari seekh...
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kavitaprayas
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[31 Mar 2010 17:39 PM]



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