जो गिर कर के संभालता है ...

Nayachintan साहित्यिक यात्राओं का अपना सुख है. कुछ नए साथियों से मुलाकातें हो जाती है. मित्र-सम्पदा बढ़ती है. ज्ञान बढ़ता है. दौलत काम नहीं आती लेकिन मित्ररूपी दौलत आपको सदा समृद्ध रखती है. इसलिए जैसे ही कही से बुलावा आता है तो मन नहीं मानता, निकल पड़ता हूँ प्रवास... [पूरी पोस्ट]
writer गिरीश पंकज

सवक्तव्य-ग़ज़ल

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[31 Mar 2010 12:54 PM]

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