अरुंधति का रूमान

निर्मल-आनन्द अरुंधति अपने दांतेवाड़ा यात्रा वृत्तान्त का अंत एक ऐसे शाएर की एक मशहूर नज़्म के एक टुकड़े से करती है, जो अपनी रुमानी क्रांतिकारिता के लिए प्रसिद्ध है- फ़ैज़।वहाँ पाया गया अंश यह है :हम अहले-सफा मर्दूदे-हरममसनद पे बिठाए जाएंगेसब ताज उछाले जाएंगेसब तख्त गिराए... [पूरी पोस्ट]
writer अभय तिवारी
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[31 Mar 2010 11:46 AM]

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