छाले

कुछ पन्ने मेरी दराज़ से.... कुछ नन्हे हाथों को आज हाथ छुडाते देखा हैउन कोमल हाथों पे छालों का एक गुलदस्ता देखा हैतपती कंकरीली धरती पे दिन भर रेंगते देखा हैखाने के चंद निवालों पे मैंने उनको पिटते देखा हैभूख मिटाने की खातिर यहाँ रूह नाचती देखी हैहर गाडी में झांकती उनकी आस टपकती देखी... [पूरी पोस्ट]
writer ●๋• नीर ஐ

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[31 Mar 2010 06:31 AM]

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