फ़रेब छल,झूठ आप रखिये सँभाल साहिब-gazal
रहेंगे हम, घर में अपने ही मेहमान कब तकरखेंगे यूं बन्द ,लोग अपनी जुबान कब तकफ़रेब छल,झूठ आप रखिये सँभाल साहिबभरोसे सच के भला चलेगी दुकान कब तकचलीं हैं कैसी ये नफ़रतों की हवायें यारोबचे रहेंगे ये प्यार के यूं मचान कब तकहैं कर्ज सारे जहान का लेके बैठे...
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श्याम सखा 'श्याम'
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[30 Mar 2010 23:05 PM]



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