वो नहीं ’गुड़ियाघर’ की नोरा जैसी.
जब उसनेएक-एक करकेझुठला दियेउसके सभी आरोप,काट दिये उसके सारे तर्क,तो झुंझलाकर वह बोला,"औरतें कुतर्की होती हैंअपने ही तर्क गढ़ लेती हैंबुद्धि तो होती नहींकरती हैं अपने मन की"वो सोचने लगी,काश...वो बचपन से होतीऐसी ही कुतर्की...,गढ़ती अपने तर्कबनाती अपनी...
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mukti
कविता
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[30 Mar 2010 23:26 PM]



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