मध्यवगीर्य है दलित की अवधारणा
मैंने पाया है कि गांव में भिन्न जाति के लोगों के लिए बोली"बाजी के मुहावरे और ाब्दावलियां अलग"अलग हैं। अगर हलवाहे मुसहर जाति से होते और उनको बैल दिक परेाान करते तो सहज ही कहते ॑चमरे हीं दे अएबउ॔ अथार्त` चमार को दे आएंगे। यहां यह भाव होता कि सामाजिक...
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राजू रंजन
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[30 Mar 2010 23:10 PM]



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