हंस रे निर्मोही हंस
हंसो शेखरूहंसो सिद्धूहंसो राजूहंस रे जानीहंस,हंस रे निर्मोही हंस।हंसो कि बचपन भूलता जा रहा है हंसनाहंसो कि लड़कियां भूल रही हैं खिलखिलानाहंसो कि दम तोड़ रहे हैं यौवन के अरमानहंसो कि बोझ बन गया है बुढ़ापाहंसो कि बढ़ रही है पागलों की तादादहत्यारों की...
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हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar
कविता
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[30 Mar 2010 21:01 PM]



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