वो धुप और वो चांदनी

हिंदी हैं हम.. जिंदगी अजीब है,हम जितने आगे बढतें हैं, उतने पीछे छुटते भी है|हमारा वजूद एक पल के लिए ना होकर कई पलों से बनता है..ये वजूद के हिस्से , अपने आप में कई हिस्से समेटे रहतें हैं|जिंदगी का मकसद जैसी फिलोस्फिकल बातें मुझे समझ नहीं आती,मुझे भावनाएं समझ आती हैं पर... [पूरी पोस्ट]
writer Astha Deo
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[22 Feb 2010 03:00 AM]

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