संगी साथी.....
कुछ था चंचल बचपन,कुछ दोस्त थे दुश्मन,जो हमको हराते थे,हर खेल में लड़ जाते थे,वही तो संगी साथी कहलाते थे..जिनसे माँ नंबर मिलाती थी,कम होने पर डाट पिलाती थी,पापा को देखकर राह में,हम दोनों छिप जाते ,पतंग लूटनी हो तो वो,धक्का दे दूजे को गिराते,वही संग बैठ...
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Astha Deo
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[23 Feb 2010 22:09 PM]



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