बालकनी

हिंदी हैं हम.. आँख खुलते ही मेरी नज़र शांतनु के चेहरे पर पड़ी.. खुली खिडकी से सूरज कि किरणें उनके चेहरें पर आ रही थी| आज भी उनका चेहरा किसी बच्चे सा निष्पाप लगता है| कल रात ,उन्हें बहुत देर तक नींद नहीं आई थी, बाप बेटे जब भी एक मत नहीं होते तो शांतनु का यहीं हाल होता... [पूरी पोस्ट]
writer Astha Deo
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[20 Mar 2010 09:35 AM]

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