गुनाहों को अपने छिपायें कहाँ तक

अंकित गुरु जी (आदरणीय पंकज सुबीर जी) द्वारा इस्लाह की हुई ये ग़ज़ल आप सभी से रूबरू हो रही है.गुनाहों को अपने छिपायें कहाँ तक.बहुत दूर जाके भी जायें कहाँ तक.गलत राह पर उसका गिरना तो तय था भला साथ देती दुआयें कहाँ तक.अहम् को बचाने की जद्दोज़हद में वो... [पूरी पोस्ट]
writer Ankit Joshi

बहरे मुतकारिब

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[30 Mar 2010 04:36 AM]

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