अमिताभ जी की नजर में डा. चरणदास सिंद्धू ( भाग-2)
अनुभव जब एकत्र हो जाते हैं तो वे रिसने लगते हैं। मस्तिष्क में छिद्र बना लेते हैं और ढुलकने लगते हैं, कभी-कभी हमे लगता है अपनी खूबियों को बखानने के लिये व्यक्ति लिख रहा है, बोल रहा है या समझा रहा है। किंतु असल होता यह है कि अनुभव बहते हैं जिसे रोक पाना...
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सुशील कुमार छौक्कर
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[29 Mar 2010 23:34 PM]



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