आवाज की हमने कभी नही सुनी !
सुबह-सुबह इक ख्वाब गिर गया है आँख सेनींद काँप उठी थी शोर सेआवाज,जिसकी अन्तिम स्थिति मौन होनी चाहिए थीसंगीत से निकल कर शोर हो चुकी हैहमारे समानांतरपरन्तु तेज बढ़ते हुएयह हिला देगीएक दिन इस पूरी कायनात कोकेवल वही कान बचे रह जायेंगेजो सुन पायेंगेकर्णातीत...
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ओम आर्य
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[29 Mar 2010 21:34 PM]



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