कविताओं का विद्रोह

Kuchh kahi kuchh unkahi उस वक़्त मेरी कवितायें,मुझसे विद्रोह कर देती हैं,जब मैं उन्हें प्रसंगों से जोड़ नहीं पाता।पर मैं उन्हें क्या समझाऊं? - कितना समझाऊं?-की - जो आजीवन प्रसंगों से खुद कटा कटा सा रहा -अपने मन के कई भागों में बँटा बँटा सा रहा -अपने अतीत के साए से सटा सटा सा... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[29 Mar 2010 12:22 PM]

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