शायद... बयाँ हो जाये
लिख रही हूँ इबारते कभी मन ही मनकभी कागज पर कलम सेसोच कर यही कि शायद इस बार हाल ए दिल आरजू ए जिंदगी और जुस्तजू ए सफ़र बयाँ हो जाये मगर मुक्कदर की मुफलिसी में ये मुनासिब कहाँ जितना चलती हूँ रास्तें उतने ही लम्बे हो जाते है हकीकत की बात हो तो कह...
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himani
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[29 Mar 2010 08:58 AM]



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