चहरे सब तमतमाये हुए है

उस्ताद शायर पुरुषोत्तम एककोई हमें न शहर में जाने है साब जीफ़िर कौन हम को काम पे रक्खे है साब जीरोजी रही न गांव में तो शहर को चलेघर अपना कौन शौक से छोडे है साब जीघरबार भी था खेत भी खलियान भी हुज़ूर वो सब तो साहूकार के गहने है साब जीदुनिया में अपने भी कभी थे दोस्त रिश्तेदारअब... [पूरी पोस्ट]
writer पुरु मालव
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[29 Mar 2010 05:59 AM]

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